
कब से सोच रहा हूँ की कुछ है जो याद नहीं आ रहा! आज जब एक तस्वीर देखि तो समझा की यह तो अपना डाकिया था जिसे में मिस कर रहा था. नाम भूल गया पर वो दो जन थे. एक सुबह की डाक लाते और एक दोपहर की. सर्दी गर्मी बरसात..बारहों महीने. उन्हें मालूम था की पोस्टकार्ड भी उतनी ही एहमियत रखते थे जितनी गीता प्रेस के कल्याण का अंक. लू के मरे बंद खिरकी को खोल चिट्ठी बंद कर देते, बारिश में प्लास्टिक में लपेट उन्हें गीला होने से बचाते. होली दिवाली आते एक छोटी इस बख्शीश ले जाते. बडे वाले अंकल तो बहुत ही अच्छे थे. स्कूल से हमारी शराफत का चिटठा घर पर नहीं दिया. हर बार वार्निंग दी ..इस बार पावती भेज रहा हूँ पर अगली बार घर पर सूद समेत बता दूंगा. एक भी इंटर व्यू का खत लेट नहीं हुआ. स्कूल के रिजल्ट आये..पत्रिका आती , मोनी आर्डर की पावती आती. दोपहर कभी पानी मांग लेते कभी दाल अचार..बीबी बीमार है जी सब्जी बनी नहीं रोटी लेकर आ गया, कभी हाजमे की दावा तो कभी सरदर्द की..एक अपनापण एक इंसान के लिए इंसान की कद्र. उनके बेटी ने जब बी ए में दाखिला लिया तो मार्क्स शीट सत्यापित कराने को घर आये तो बिना चाय पिलाये बाबु जी ने जाने नहीं दिया. बेटी को पढ़ा रहे हो बहुत बड़ा काम कर रहे हो..सुन कर रो पड़े थे..हम तो कुछ कर नहीं पाए साब यह बच्चे कुछ करलें. गाँव में कोई जनता भी नहीं की में पोस्ट मन हूँ..सब समझते हैं की पोस्ट मास्टर हूँ. बच्चों को किसी को बताने में शर्म आती है की उनका बाप डाकिया है. सही ही तो है..कौन डाकिया बनना चाहता है. आपने किसी को कहते सुना है बड़ा हो कर में डाकिया बनूँगा...बस अब तो इनका ही सहारा है..
अब पता नहीं कहाँ चले गए यह लोग. आते तो हैं हम नहीं जानते. हमारा डाकिया कौन है हमें नहीं मालूम. पर हम उनको आज याद करते हैं.


